जयपुर के विभिन्न दर्शनीय स्थल
अगर आप राजस्थान आये और जयपुर न घूमे तो
आपका राजस्थान आना व्यर्थ है। अगर आपको ध्यान हो तो भारत के सबसे बड़े राज्य
राजस्थान की राजधानी जयपुर है। जयपुर शहर की स्थापना 18 नवंबर 1727 ई. को हुई थी जिसकी नींव कछवाहा शासक सवाई जयसिंह (1700-1743 ई.) के द्वारा रखी गई थी। अगर आप जयपुर घूमेंगे तो आप पाएंगे की यहाँ की
बिल्डिंग्स गुलाबी रंग की है इस कारण इसे "गुलाबी नगर" के नाम से जाना
जाता है। अब आईये हम जयपुर के विभिन दर्शनीय स्थलों के बारे में जानते है:-
1. हवा महल
यह एक राजसी-महल है। इसे सन 1799 में महाराजा सवाई प्रताप सिंह ने बनवाया था और इसे किसी 'राजमुकुट' की तरह वास्तुकार लाल चंद उस्ता
द्वारा डिजाइन किया गया था। यह 5 मंजिला ईमारत है
जो बाहर से देखने पर मधुमक्खी के छत्ते के समान दिखाई देती है, जिसमें 953 बेहद खूबसूरत और आकर्षक
छोटी-छोटी जालीदार खिड़कियाँ हैं, जिन्हें झरोखा कहते
हैं। इन खिडकियों को जालीदार इसलिए बनाया गया था की राजघराने की महिलायें इन
खिडकियों से महल के नीचे सडकों के समारोह व गलियारों में होने वाली रोजमर्रा की
जिंदगी की गतिविधियों का अवलोकन कर सकें। इसके अतिरिक्त, "वेंचुरी प्रभाव" के कारण इन जटिल संरचना वाले जालीदार झरोखों से सदा
ठण्डी हवा, महल के भीतर आती रहती है, जिसके कारण तेज गर्मी में भी महल सदा वातानुकूलित सा ही रहता है।
यह चूने, लाल और गुलाबी बलुआ पत्थर से निर्मित
है। यह भवन भगवान श्री कृष्ण एवम् राधा को समर्पित है।
2. सिटी पैलेस
सिटी पैलेस
जयपुर का मुख्य आकर्षण हैं।
सिटी पैलेस
को दो वास्तुकारों विद्याधर भट्टाचार्य और सर सैमुअल स्विंटन जैकब ने डिजाइन किया
था।
सिटी पैलेस
राजपूत, मुगल और
यूरोपीय शैलियों की वास्तुकला का एक संयोजन है।
सिटी पैलेस
जयपुर में मुख्य रूप से दो हिस्से है। एक हिस्से में संग्रहालय जबकि दूसरे हिस्से में जयपुर के पूर्व शासकों के
वंशजों का निवास स्थान है।
सिटी पैलेस
में देखने के लिए चांदी के जार हैं जो गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हैं
और दुनिया के सबसे बड़े शुद्ध चांदी के जारों में से एक हैं।
इस पैलेस में
सवाई माधोसिंह प्रथम द्वारा पहना गया कपड़े का सेट रखा गया है जो 1.2 मीटर चौड़ा
था और इसका वजन 250 किलोग्राम था।
3. नाहरगढ़
किला
नाहरगढ़ किले का
निर्माण जयपुर के संस्थापक सवाई राजा जयसिंह द्वितीय के दवारा 1734 ई. में करवाया गया था। इस किले का इस्तेमाल
गर्मियों में महल के रूप में किया जाता था। इस किले की सबसे खास बात यह है कि इस
किले पर कभी हमला नहीं हुआ। हालाँकि यह किला 18 वीं शताब्दी में मराठा सेनाओं के
साथ संधियों पर हस्ताक्षर करने जैसी प्रमुख ऐतिहासिक घटनाओं का स्थल रहा है।
इस किले का नाम
पहले सुदर्शनगढ़ हुआ करता था लेकिन बाद में इसे नाहरगढ़ किले के नाम से जाना जाने
लगा, जिसका मतलब “शेर का निवास
स्थान” होता है।
प्रसिद्ध मान्यताओं के अनुसार नाहर नाम नाहर सिंह भोमिया से लिया गया है, जिन्होंने किले के लिये जगह उपलब्ध करवाई और निर्माण करवाया। नाहर की याद
में किले के अंदर एक मंदिर का निर्माण भी किया गया है, जो
उन्ही के नाम से जाना जाता है।
यह किला पहले आमेर
के राजाओ की राजधानी हुआ करता था।
कुछ बॉलीवुड फिल्मो
की शूटिंग भी नाहरगढ़ के किले में हुई है जैसे "रंग दे बसंती", "जोधा अकबर"और "शुद्ध देसी रोमांस"।
नाहरगढ़ किले के
परिसर आकर्षक संरचनाओं के एक आलवा जैविक उद्यान भी स्थित है जो इस किले का एक खास
आकर्षण है। नाहरगढ़ अभयारण्य के 7.2 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैले, जैविक पार्क को बारीक ग्रेनाइट और क्वार्टजाइट चट्टानों से सजाया गया है।
इस किले को डरावना
भी माना जाता है क्योंकि वहां कई ऐसी गतिविधियां हुई हैं जिसके चलते इस हॉन्टिड
प्लेस भी कहा जाता है।
4. जयगढ़ किला
जयगढ़ दुर्ग जयपुर
में अरावली पर्वतमाला में चील का टीला (ईगल की पहाड़ी) पर आमेर दुर्ग एवं मावठा
झील के ऊपरी ओर बना किला है। अगर दुर्ग के निर्माण की बात करे तो इस दुर्ग का
निर्माण महाराजा जय सिंह द्वितीय ने 1667 ई. में आमेर
दुर्ग एवं महल परिसर की सुरक्षा हेतु करवाया था। इस दुर्ग को "जीत का
किला" भी कहा जाता है।
यहाँ पर विश्व की सबसे बड़ी तोप "जयबाण" राखी हुई है। इस तोप का उपयोग आज तक किसी युद्ध में नहीं हुआ है परन्तु उसका केवल एक
बार परीक्षण किया गया था। 50 टन वजन वाले जयबाण को हर शॉट के लिए 100 किलो बारूद
की आवश्यकता होती है।
जयगढ़ किले का
सर्वोच्च बिंदु दीया बुर्ज कहलाता है। इस सात मंजिला टॉवर
से जयपुर के ध्वज की मेजबानी की जाती है। अभी तक महाराजा के जन्मदिन के अवसर पर
यहां एक तेल का दीपक जलाया जाता है।
इसके अलावा यहाँ पर
काफी सारे पुराने मंदिर भी दर्शनीय है।
5. आमेर का किला
यह जयपुर नगर का
मुख्य पर्यटन स्थल है। आमेर के बसने से पहले इस जगह मीणा जनजाति के लोग निवास करते
थे ,जिन्हे कच्छवाह राजपूत शासको ने अपने अधीन कर लिया, जिस पर कालांतर में कछवाहा राजपूत मान सिंह प्रथम ने सन 1592 ई में इस
दुर्ग का निर्माण करवाया।आमेर का किला लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर में निर्मित है।
आमेर के किले के पास मावठा झील स्थित है जो किले के आकर्षण को और बढ़ा देती है।इस
किले के अंदर ‘दीवान-ए-आम’, ‘शीश
महल’ और यहां तक कि ‘सुख महल’ जैसी प्रमुख इमारते स्थित है। इस किले में शीला देवी का मंदिर भी स्थित
है। सन 2013 में इसे यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल सूची में शामिल किया गया था।
फिल्म मुगल-ए-आजम का
गाना "प्यार किया तो डरना क्या" यही फिल्माया गया था।
6. जल महल
जब आप जयपुर-आमेर मार्ग पर जायेंगे
तो आप एक झील देखेंगे जिसका नाम है मानसागर झील। इसी झील के बीचो -बीच एक महल बना
हुआ है जिसे जल महल के नाम से जाना जाता है। इस महल का निर्माण सवाई प्रतापसिंह ने
1799 ईस्वी में करवाया था।
मानसागर झील के
बीचों-बीच होने के कारण इसे 'आई बॉल' भी कहा जाता है।इसके अलावा इसे 'रोमांटिक महल' के नाम से भी जाना जाता है।
यह एक पांच
मंजिला महल है जिसकी चार मंजिले पानी के अंदर रहती है तथा एक मंजिल पानी के बाहर
दिखाई देती है। इसी कारण इस महल में गर्मी नहीं लगती है।
चांदनी रात में
झील के पानी में इस महल का नजारा बेहद आकर्षक होता है।
7. अल्बर्ट हॉल म्यूज़ियम
यह संग्रहालय राजस्थान में जयपुर के रामनिवास बाग में स्थित है। यह राजस्थान का सबसे पुराना संग्रहालय है। इस संग्रहालय को लंदन के अल्बर्ट संग्रहालय की तर्ज पर बनाया गया है और यह "भारतीय-अरब शैली" का प्रतीक है।
इस संग्रहालय का डिजाइन सन् 1876 में कर्नल सर
स्विंटन जैकब ने तैयार किया था। प्रिंस ऑफ वेल्स "किंग एडवर्ड सप्तम" की
भारत यात्रा पर उनके सत्कार के लिए इसे तैयार किया गया था।1880 में महाराजा सवाई
माधोसिंह द्वितीय के सुझाव पर, स्थानीय कारीगरों के उत्पादों को
प्रदर्शित करने के लिए 1881 में एक अस्थायी संग्रहालय बनाया गया था। अल्बर्ट हॉल
को 1887 में जयपुर पीडब्ल्यूडी के निदेशक सैमुअल स्विंटन जैकब ने पूरा किया था।
इस संग्रहालय के अंदर पुराने समय के सामान जैसे
मिनिएचर पेंटिंग, कालीन, मेटल
और लकड़ी के शिल्प, खिलौने, गुडि़या, शस्त्र, हथियार और टालेमी काल की मिस्त्र की एक ममी का दुर्लभ संग्रह यहां प्रदर्शित है।
8. गलता जी
गलता मन्दिर शहर में पूर्वी अरावली पर्वत
श्रृंखला में स्थित एक प्रमुख हिन्दू धार्मिक स्थल है। गलता जी मंदिर का निर्माण 16वीं शताब्दी में दीवान
राव कृपाराम द्वारा करवाया गया था, जो कि राजपूत शासक
सवाई जय सिंह के सलाहकार भी थे।गलता धाम 'सात कुण्ड' और अनेक मंदिरों के साथ-साथ प्राकृतिक खूबसूरती के लिए पहचाना जाता है।
गलताजी मंदिर का निर्माण गुलाबी रंग के बलुआ पत्थर के उपयोग से किया गया है।
किवदंती के अनुसार गलता तीर्थ ऋषि गालव
की तपोस्थली थी तथा यहाँ ऋषि गालव ने साठ हज़ार वर्षों तक तपस्या की थी।
शहर की पूर्वी पहाडियों पर अवस्थित गलता
के कुण्ड में गोमुख से निरन्तंर पानी बहता रहता है, जो सूरज कुण्ड में गिरता है। इस पवित्र कुण्ड में स्नान
करने के लिए दूर-दराज से लोग यहाँ आते हैं।
सावन और कार्तिक माह में यहाँ पवित्र
कुण्डों में हज़ारों की संख्या में श्रद्धालु स्नान करने के लिए आते हैं।
यहां पर बहुत ज्यादा संख्या में बंदर
रहते हैं, जिस कारण इस
प्राचीन मंदिर को "बंदरों का मंदिर" भी कहा जाता है।
ऐसा भी कहा जाता है कि इस जगह पर तुलसीदास द्वारा पवित्र
रामचरित्र मानस के खंड लिखे गए थे।
9. बिड़ला मंदिर
जयपुर का बिड़ला मंदिर 1988 ई में बिरला ग्रुप ऑफ़
इंडस्ट्रीज के द्वारा बनाया गया था। बिड़ला मंदिर भगवान श्री नारायण तथा माँ श्री
लक्ष्मी को समर्पित है। इस कारण इसे लक्ष्मीनारायण
मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यह प्रसिद्ध मंदिर
जयपुर के मोती डुंगरी इलाके के समीप बना है।
इस मंदिर के निर्माण में सफ़ेद संमरमर का
प्रयोग हुआ है। इस मंदिर के पास ही पहाड़ी पर मोती डूंगरी फोर्ट भी स्थित है जो
स्कॉटिश शैली से बना एक मशहूर क़िला है।
इस मंदिर में भगवान विष्णु जी और उनकी
पत्नी लक्ष्मी जी की मूर्तियां स्थापित है साथ ही भगवान गणेश की मूर्ति भी इस
मंदिर में स्थापित है।
बिड़ला मंदिर से संबंधित सबसे रोचक तथ्य
यह है कि जिस जगह मंदिर बनवाया गया है उस जमीन को बिड़ला प्रतिष्ठान ने जयपुर के
तत्कालीन महाराजा से एक रुपये की नाममात्र की राशि देकर ख़रीदा था।
10. मोती डूंगरी गणेश जी मंदिर
जयपुर में एक छोटी पहाड़ी पर स्थित मोती
डूंगरी मंदिर जयपुर के लोकप्रिय मंदिरों में से एक है जो मोती डूंगरी पैलेस से
घिरा है। भगवान गणेश को समर्पित मोती डूंगरी गणेश मंदिर का निर्माण 1761 में सेठ जय राम
पल्लीवाल की निगरानी में किया गया था।
इस मंदिर में दाहिनी सूंड़ वाले गणेशजी
की विशाल प्रतिमा है।
एक पौराणिक कथा है जो आपको बता रहे है।
एक बार मेवाड़ के राजा भगवान गणेश की मूर्ति के साथ यात्रा से लौट रहे थे। उन्होंने
निश्चय किया कि उनकी बैलगाड़ी को जहां भी रोका जायेगा वहां ही गणेश जी एक का मंदिर
बनाएंगे और गाड़ी डुंगरी पहाड़ी के नीचे रुकी तो उसी स्थान पर मंदिर का निर्माण
राजा और सेठ जय राम पल्लीवाल के निरीक्षण के तहत किया गया था जो आज यह पूरी शान के
साथ श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है।
हिंदू धर्म के अनुसार, भगवान गणेश बुध के
देवता हैं, इसलिए हर बुधवार का दिन मंदिर परिसर के अंदर
एक बड़े मेले का आयोजन किया जाता है। मंदिर परिसर में एक शिव लिंग भी है जो महा
शिवरात्रि की रात को खुलता है। जो मंदिर को अद्वितीय बनाता है क्योंकि यह भारत का
एकमात्र गणेश मंदिर है जिसे भगवान शिव के भक्तो द्वारा देखा जाता हैं।
इस मंदिर में गणेश भक्त गणपति पर सिंदूर
का चोला चढ़ाते हैं।
मोती डूंगरी गणेश मंदिर में शादी के समय
पहला निमंत्रण-पत्र मंदिर में चढ़ाने की परंपरा है। मान्यता है कि निमंत्रण पर
मोती डूंगरी गणेश उनके घर आते हैं और शादी-विवाह के सभी कार्यों को शुभता से पूर्ण
करवाते हैं। ऐसे में इस मंदिर में जयपुर के आसपास से भी लोग दूर-दूर से शादी का
निमंत्रण देने पहुंचते हैं।
11. गोविंद देवजी मंदिर
गोविंद देवजी मंदिर का निर्माण 1590 ई में जयपुर के
राजा मान सिंह द्वारा किया गया था।
गोविंद देवजी का मंदिर जयपुर, राजस्थान का
प्रसिद्ध हिन्दू धार्मिक स्थल है। भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित यह मंदिर जयपुर का
सबसे प्रसिद्ध बिना शिखर वाला मंदिर है। यह चन्द्र महल के पूर्व में बने जननिवास
बगीचे के मध्य अहाते में स्थित है। संरक्षक देवता गोविंदजी की मूर्ति पहले वृंदावन
के मंदिर में स्थापित थी, जिसको सवाई जयसिंह द्वितीय ने
अपने परिवार के देवता के रूप में यहाँ पुनः स्थापित किया था।
'जन्माष्टमी' के अवसर पर यहाँ लाखों की संख्या में भक्त भगवान गोविंद के दर्शन करते
हैं। गोविंद देवजी का मंदिर चंद्रमहल गार्डन से लेकर उत्तर में तालकटोरे तक विशाल
परिसर में फैला हुआ है।
गोविंद देव जी मंदिर जयपुर का एक प्रमुख
धार्मिक केंद्र है, जिसके आसपास कम से कम 20 मंदिर हैं आप
गोविंद देव जी मंदिर के साथ-साथ अन्य मंदिर भी घूम सकते है।
12. वर्ल्ड ट्रेड पार्क
जयपुर में वर्ल्ड ट्रेड पार्क का निर्माण
2009 हुआ था तथा इस
खुबसूरत बिल्डिंग का उद्घाटन 2012 में शाहरुख खान
ने किया था।
वर्ल्ड ट्रेड पार्क को बनवाने में कुल 500 करोड़ रूपये
खर्च हुये थे और यह 2 साल में बनकर तैयार हुआ था।
जयपुर का मशहूर शॉपिंग व मनोरंजक स्थल जो
आपको अपने भव्य आकार से अचंभित कर देगा। यह 11 मंज़िला इमारत है जो दो ब्लॉक में विभाजित है, एक उत्तर में और दूसरा दक्षिण में। दोनों
इमारतें एक पुल से जुड़ती हैं, जिसमें रेस्तरां बना हुआ
है।यह पार्क 52 एकड़ बड़े क्षेत्र में फैला हुआ
है। यहाँ 500 कपड़ों के स्टोर हैं जिनमें हर तरह
के कपड़े आपको मिल जाऐंगे। यहाँ एक बड़ा फूड कोर्ट है जहाँ बैठकर आप स्वादिष्ट
भोजन का लुत्फ़ उठा सकते हैं और सिनेमाघर आदि है।
वर्ल्ड ट्रेड पार्क जयपुर में एक
डिस्प्ले सिस्टम शामिल है जहां 24 प्रोजेक्टर इसकी छत पर एक एकल छवि बनाते हैं। यह दुनिया में इस तरह का
पहला सिस्टम है।
डब्ल्यूटीपी को भारत के बीसीआई द्वारा
"मॉल ऑफ द ईयर" और "बेस्ट आर्किटेक्चर" से सम्मानित किया गया
है।
13. जंतर - मंतर जयपुर
जयपुर में
स्थित जंतर मंतर एक खगोलीय वैधशाला है। यह भारत की पांच खगोलीय वेधशालाओं में से
सबसे बड़ा है।
इसका निर्माण जयपुर के संस्थापक एवं खगोलशास्त्री महाराजा
सवाई जयसिंह द्वारा अंतरिक्ष और समय की सही जानकारी प्राप्त करने के उद्देश्य 1724 से 1734 ई. के बीच कराया गया था। महाराजा सवाई जयसिंह द्वारा निर्मित पांच
वेधशालाओं में से आज केवल दिल्ली और जयपुर के जंतर मंतर ही शेष बचे हैं, बाकी पुराने खंडहर में तब्दील हो चुके हैं।
यूनेस्को ने 1 अगस्त 2010 को जंतर-मंतर को " विश्व धरोहर सूची " में शामिल किया था। विश्व
धरोहर सूची में शामिल जंतर-मंतर राजस्थान प्रदेश का पहला और देश का 28 वां स्मारक हो गया है।
जयपुर की वेधशाला में उपस्थित यंत्रों के द्वारा की गई
गणनाओं के आधार पर आज भी यहां का पंचांग तैयार किया जाता है।
प्रमुख यंत्र
जयपुर के जन्तर मन्तर में स्थित प्रमुख यन्त्र हैं- बृहत
सम्राट यन्त्र, लघु सम्राट
यन्त्र, जयप्रकाश यन्त्र, रामयंत्र, ध्रुवयंत्र, दक्षिणायन्त्र, नाड़ीवलययन्त्र, राशिवलय, दिशायन्त्र, लघुक्रांति यन्त्र, दीर्घक्रांति यन्त्र, राजयंत्र, उन्नितांश यन्त्र, और दिगंश यन्त्र। इनके अलावा
यहां महत्वपूर्ण ज्योतिषीय गणनाओं और खगोलीय अंकन के लिए क्रांतिवृत यंत्र, यंत्र राज आदि यंत्रों का भी प्रयोग किया जाता रहा था।
(I) उन्नतांश
यंत्र
जंतर मंतर के प्रवेश द्वार के ठीक बांये ओर एक गोलकार
चबूतरे के दोनो ओर दो स्तंभों के बीच लटके धातु के विशाल गोले को उन्नतांश यंत्र
के नाम से जाना जाता है। यह यंत्र आकाश में पिंड के उन्नतांश और कोणीय ऊंचाई मापने
के काम आता था।
(II) दक्षिणोदक
भित्ति यंत्र
उन्नतांश यंत्र के पूर्व में उत्तर से दक्षिण दिशाओं के छोर
पर फैली एक दीवारनुमा इमारत दक्षिणोदत भित्तियंत्र है। सामने के भाग में दीवार के
मध्य से दोनो ओर सीढियां बनी हैं जो दीवार के ऊपरी भाग तक जाती हैं। जबकि दीवार का
पृष्ठ भाग सपाट है। यह यंत्र मध्यान्न समय में सूर्य के उन्नतांश और उनके द्वारा
सूर्य क्रांति व दिनमान आदि जानने के काम आता था।
(III) दिशा
यंत्र
यह एक सरल यंत्र है। जंतर मंतर परिसर में बीचों बीच एक बड़े
वर्गाकार समतल धरातल पर लाल पत्थर से विशाल वृत बना है और केंद्र से चारों दिशाओं
में एक समकोण क्रॉस बना है। यह दिशा यंत्र है जिससे सामान्य तौर पर दिशाओं का
ज्ञान होता है।
(IV) सम्राट
यंत्र
जंतर मंतर में सबसे विशाल यंत्र सम्राट यंत्र है। अपनी
भव्यता और विशालता के कारण ही इसे सम्राट यंत्र कहा गया। यंत्र की भव्यता का
अंदाजा इसी से हो जाता है कि धरातल से इसके शीर्ष की ऊंचाई 90 फीट
है। सम्राट यंत्र में शीर्ष पर एक छतरी भी बनी हुई है। यह यंत्र ग्रह नक्षत्रों की
क्रांति, विषुवांश और समय ज्ञान के लिए स्थापित किया
गया था।
(V) षष्ठांश
यंत्र
षष्ठांश यंत्र, सम्राट यंत्र का ही एक भाग है। यह
वलयाकार यंत्र सम्राट यंत्र के आधार से पूर्व और पश्चिम दिशाओं में चन्द्रमा के
आकार में स्थित है। यह यंत्र भी ग्रहों-नक्षत्रों की स्थिति और अंश का ज्ञान करने
के लिए प्रयुक्त होता था।
(VI) जयप्रकाश
यन्त्र
जयप्रकाश यंत्र ’क’ और
जयप्रकाश यंत्र ’ख’
जय प्रकाश यंत्रों का आविष्कार स्वयं महाराजा जयसिंह ने
किया। कटोरे के आकार के इन यंत्रों की बनावट बेजोड़ है। जंतर मंतर परिसर में ये
यंत्र सम्राट यंत्र और दिशा यंत्र के बीच स्थित हैं। इनमें किनारे को क्षितिज
मानकर आधे खगोल का खगोलीय परिदर्शन और प्रत्येक पदार्थ के ज्ञान के लिए किया गया
था। साथ ही इन यंत्रों से सूर्य की किसी राशि में अवस्थिति का पता भी चलता है। ये
दोनो यंत्र परस्पर पूरक हैं।
(VII) नाड़ीवलय यंत्र
यह यंत्र प्रवेशद्वार के दायें भाग में स्थित है। यह दो
गोलाकार फलकों में बंटा हुआ है। इनके केंद्र बिंदु से चारों ओर दर्शाई विभिन्न
रेखाओं से सूर्य की स्थिति और स्थानीय समय का सटीक अनुमान लगाया जा सकता है।
(VIII) ध्रुवदर्शक
पट्टिका
ध्रुवदर्शक पट्टिका ध्रुव तारे की स्थिति और दिशा ज्ञान
करने के लिए प्रयुक्त होने वाला सरल यंत्र है। उत्तर दक्षिण दिशा की ओर दीवारनुमा
यह पट्टिका दक्षिण से उत्तर की ओर क्रमश: उठी हुई है। इसके दक्षिणी सिरे पर नेत्र
लगाकर देखने पर उत्तरी सिरे पर घ्रुव तारे की स्थिति स्पष्ट होती है।
(IX) राशि वलय
यंत्र
इनकी संख्या 12 है जो 12 राशियों को इंगित करते हैं। प्रत्येक राशि और उनमें ग्रह-नक्षत्रों की
अवस्थिति को दर्शाते इन बारह यंत्रों की खास विशेषता इन सबकी बनावट है। देखने में
ये सभी यंत्र एक जैसे हैं लेकिन आकाश में राशियों की स्थिति को इंगित करते इन
यंत्रों की बनावट भिन्न भिन्न है
(X) चक्र यंत्र
लोहे के दो विशाल चक्रों से बने इन यंत्रों से खगोलीय
पिंडों के दिक्पात और तात्कालिक के भौगोलिक निर्देशकों का मापन किया जाता था। यह
राशिवलय यंत्रों के उत्तर में स्थित है।
(XI) रामयंत्र
राम यंत्र में स्तंभों के वृत्त के बीच केंद्र तक डिग्रियों
के फलक दर्शाए गए हैं। इन फलकों से भी महत्वपूर्ण खगोलीय गणनाएं की जाती थीं।
रामयन्त्र जंतर मंतर की पश्चिमी दीवार के पास स्थित दो यंत्र हैं। इन यंत्रों के
दो लघु रूप भी जंतर मंतर में इन्हीं यंत्रों के पास स्थित हैं।
(XII) लघु सम्राट यंत्र
लघु सम्राट यंत्र घ्रुव दर्शक पट्टिका के पश्चिम में स्थित
यंत्र है। इसे धूप घड़ी भी कहा जाता है। इस यंत्र से स्थानीय समय की सटीक गणना
होती है। लाल पत्थर से निर्मित यह यंत्र सम्राट यंत्र का ही छोटा रूप है इसीलिये
यह लघुसम्राट यंत्र के रूप में जाना जाता है।
(XIII) दिगंश यंत्र
इस यंत्र के द्वारा पिंडों के दिगंश का ज्ञान किया जाता था।
दिगंश यंत्र निकास द्वार के पास स्थित है। यह यंत्र वृताकार प्राचीर में छोटे
वृत्तों के रूप में निर्मित
है।
14. चोखी धानी
अगर आप राजस्थान के ग्रामीण वातावरण से परिचित होना चाहते है तो ये आपके लिए ही
है। “चोखी ढाणी” का मतलब है अच्छा गांव। इस गांव को जयपुर में साल 1989 में बनाया गया था। इस गांव को बनाने के पीछे यह मंशा थी कि जो भी पर्यटक
जयपुर आए, वह राजस्थान की ग्रामीण अद्भुत कला संस्कृति
को देख सकें। यह गांव करीब दस एकड़ में फैला हुआ है। यहां आपको राज्य के अलग-अलग
लोक-नृत्य भी देखने को मिलेंगे।
आपको
बता दें कि भले ही चोखी ढाणी शहर से बिलकुल बाहर है पर यह 5 स्टार होटल की सुविधाओं के
साथ-साथ राजस्थानी गांव जैसा एहसास दिला
सकता है। इस कारण यह पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है।
यहाँ
का खाना आपको राजस्थानी जायके का अनुभव देगा।














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