दौसा जिले के विभिन्न दर्शनीय स्थल
दौसा
राजस्थान राज्य का एक छोटा प्राचीन शहर और जिला है, दौसा का नाम संस्कृत शब्द धौ-सा लिया गया है, जिसका
शाब्दिक अर्थ "स्वर्ग की तरह सुंदर" है। राष्ट्रीय राजमार्ग 11 पर जयपुर से 55 किमी दूर स्थित यह शहर देव
नागरी के रूप में भी जाना जाता है। शहर पूर्व कच्छवाहा राजवंश का पहला मुख्यालय था
और दौसा का इतिहास बहुत प्राचीन है और पुरातात्विक महत्व इससे जुड़ा हुआ है। दौसा
जिला राजस्थान में एक प्रामाणिक ग्रामीण जीवन का अनुभव प्रदान करता है।
1991 से पहले, दौसा जयपुर जिले का हिस्सा था। जब
जयपुर का पुनर्निर्माण हुआ, तो दौसा ललसोट, सीकरी और बसवा के साथ एक अलग जिला बन गया था। 1992 में, एक बार फिर बदलाव हुआ और महवा तहसील को
दौसा जिले में भी शामिल किया गया था। इससे पहले, महवा
सवाई माधोपुर जिले का हिस्सा था। आईये अब जानते है दौसा जिले के महत्वपूर्ण
दर्शनीय स्थलों के बारे में :-
1. चाँद बावड़ी
चांद बावड़ी
यह पुराने जमाने का एक सीढीनुमा कुंआ है। जिसे जिसे स्टेप वेल (Step Well) के नाम से भी जाना जाता है।
चांद बावड़ी राजस्थान के दौसा जिले की बांदीकुई तहसील के आभानेरी गांव मे स्थित है। चांद बावड़ी दौसा से 35 किमी कि दूरी पर,और बांदीकुई से 7 किमी की दूरी पर स्थित
है।
चांद बावड़ी
का निर्माण निकुम्भ वंश के राजा चांद या चंद्रा ने 7 वी – 9 ईसवीं मे करवाया था। उन्हीं के नाम
पर इसका नाम चांद बावड़ी पडा। चांद बावड़ी प्राचीन और भारत की सबसे बडी बावड़ी है।
जिसकी गहराई लगभग 100 फीट गहरी है। जिसमें नीचे
उतरने को तीन तरफ लगभग 3500 सीढियां है। 35 मीटर के वर्गाकार मे बनी यह बावड़ी वास्तुकला का अद्भुत नमूना है। बडी
संख्या में पर्यटक यहां आते है।
चाँद बावड़ी
एशिया महाद्वीप का सबसे पुराना स्टेप वेल्स है। चाँद बावड़ी एक ऐसा कुंआ है जो यहां
आने वाले पर्यटकों को अपनी तरफ बेहद आकर्षित करता है। चाँद बावड़ी में एक सामान कई
सारी सीढ़ियां बनी हैं जो यहां आने वाले पर्यटकों को भ्रमित कर देती हैं।
2. हर्षत माता मंदिर
हर्षत माता
मंदिर चांद बावड़ी से लगभग 100 मीटर
की दूरी पर स्थित है। गुम्बदाकार बना यह छोटा सा मंदिर खुशी की देवी हर्षत माता को
समर्पित है। हर्षत माता मंदिर स्टेप वेल्स के बगल में स्थित एक प्रसिद्ध मंदिर हैं
जो पर्यटकों और भक्तों को अपनी तरफ बेहद आकर्षित करता है। मंदिर को देखने से लगता
है कि यह भी बावड़ी के समकालीन वर्षों मे निर्मित है। मंदिर के खंभों और दिवारों पर
नक्काशी का एक अद्भुत नमूना देखने को मिलता है। लोगों का मानना है कि हर्षत माता
की पूजा अर्चना करने से माता भक्तों के जीवन मे खुशियां भर देती है। इसी मान्यता
के चलते भक्त निरंतर माता के दर्शन के लिए आते है।
इस मंदिर को
इस्लामिक शासकों द्वारा नष्ट कर दिया गया था। अब यहां पर सिर्फ खंडर ही बचें हुए
हैं। यहाँ पर आप एक भव्य खुले आंगन में स्तंभों और दीवारों पर नक्काशी के साथ
अदभुद मूर्तियों को देख सकते हैं।
इस मंदिर की
वर्तमान सुंदरता देख कर कोई भी पुराने समय में मंदिर की महिमा का अंदाजा लगा सकता
है। आपको बता दें कि यह मंदिर यहां आने वाले पर्यटकों को बिलकुल निराश नहीं करता।
मंदिर और इसके आसपास की प्राकृतिक सुंदरता देखकर कोई भी मंत्रमुग्ध हो सकता है।
अगर आप दौसा की यात्रा करने के लिए जा रहें हैं तो आपको हर्षत माता मंदिर के दर्शन
करने के लिए अवश्य जाना चाहिए।
3. मेहंदीपुर बालाजी मंदिर
दौसा से 49 किमी की दूरी पर मेहंदीपुर
बालाजी मंदिर एक भव्य और दिव्य मंदिर है। मेहंदीपुर बालाजी मंदिर दौसा जिले में
स्थित एक हिंदू मंदिर है जो हनुमान जी को समर्पित है। मंदिर राजपूत वास्तुकला शैली
से निर्मित है। यह मंदिर भारत में इतना लोकप्रिय कि हर साल दूर-दूर से इस मंदिर
में तीर्थ यात्रियों का आना जाना लगा रहता है। हनुमान जी को ही बालाजी के रूप में
भी जाना जाता है और उनके मंदिर के सामने सियाराम को समर्पित एक मंदिर भी स्थित है।
मेहंदीपुर बालाजी मंदिर के बारे में ऐसा माना जाता है कि भगवान अपने भक्तों को
बुरी आत्माओं और परेशानी से मुक्ति दिलाते हैं।
मंदिर में
आने वाले भक्त बालाजी को बूंदी के लड्डू का भोग लगाते हैं और भैरव बाबा को उड़द की
दाल और चावल चढ़ाते हैं जो बुरी आत्माओं से मुक्ति पाने में उनकी मदद करते हैं।
मंदिर में
शनिवार और मंगलवार को भीड़ काफी ज्यादा होती है क्योंकि यह बालाजी के सबसे खास दिन
होते हैं। लोगों की इस मंदिर मे बडी आस्था है। यहां बालाजी की मूर्ति से एक जल
धारा निकलती है। जिसका जल एक टैंक मे एकत्र कर भक्तों को प्रसाद स्वरूप वितरित
किया जाता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार मंदिर मे भूत, प्रेत, बुरी
आत्माओं से भी मुक्ति मिलती है।
4. दौसा का किला
दौसा का किला
राजस्थान के दौसा जिले में ‘देवागिरि’ नामक पहाड़ी पर स्थित है।
यह कछवाहा
राजवंश की पहली राजधानी थी। अगर हम इसकी आकृति की बात करे तो इसकी आकृति ‘सूप’ के
समान है।
इस दुर्ग का
निर्माण प्रारंभिक तौर पर बड़गूजरों (गुर्जर-प्रतिहारों) द्वारा करवाया गया था।
बाद में कछवाहा शासकों ने इसका निर्माण करवाया।
यह विशाल
मैदान से घिरा हुआ गिरिदुर्ग है। इसमें प्रवेश के दो दरवाज़े हैं- हाथीपोल तथा मोरी दरवाज़ा
मोरी दरवाज़े
के पास में ही ‘राजाजी का
कुँआ’ स्थित है। इसके पास में ही चार मंजिल की विशाल
बावड़ी स्थित है।
इस बावड़ी के
निकट बैजनाथ महादेव का मंदिर स्थित है।
दौसा दुर्ग
की ऊँची चोटी पर गढ़ी में नीलकण्ठ महादेव का मंदिर स्थित है। गढ़ी के सामने 13.6 फीट लम्बी तोप स्थित है।
गढ़ी के भीतर
अश्वशाला ‘चौदह राजाओं
की साल’, प्राचीन कुण्ड तथा सैनिकों के विश्रामगृह
स्थित हैं।




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